रिटेल में एफ.डी.आई. और भारतीय राजनीति
एच.एन.सिंह हाड़ा1’ , आर.पी. सहारिया2
1सहायक प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान शास. महाविद्यालय, जौरा, जिला मुरैना (म.प्र.)
2सहायक प्राध्यापक, अर्थशास्त्र शास. जे.एम.पी. महावि., तखतपुर, बिलासपुर (छ.ग.)
शोध सारांश
1991 के पश्चात नई आर्थिक उदारीकरण नीति तथा भूमण्डलीयकरण ने भारतीय बाजार के द्वार विदेशी व्यापारियों के लिये खोल दिये । इसमें कोई सन्देह नही है कि पिछले दो दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व सुधार हुआ है । परन्तु जब नई आर्थिक नीति घोशित की गई थी तब आशंका व्यक्त की गई थी कि इसके परिणाम भयंकर होंगे । आशंका निर्मूल साबित हुई तथा देश विकास के पथ की ओर अग्रसर है । पिछले दस वर्शो की स्थायी सरकार ने विदेशी व्यापारियों को अच्छा माहौल प्रदान किया और वे भारत में निवेश एवं व्यापार में अपनी रूचि प्रदर्शित कर रहे है । इसी क्रम में भारतीय सरकार ने खुदरा बाजार में एफ.डी.आई. को दिसम्बर 2012 में अनुमति दी । विपक्ष के लगातार विरोध के बावजूद संसद में एफ.डी.आई. का प्रस्ताव पास हुआ । एफ.डी.आई. लागू हो जाने से मल्टी ब्राण्ड रिटेल में विदेशी कम्पनियों की हिस्सेदारी 51 फीसदी जबकि सिंगल ब्राण्ड में 100 फीसदी हो जावेगी । प्रश्न यह उठता है कि वही विपक्ष जब सत्ता में था एफ.डी.आई. के पक्ष में था लेकिन आज विरोध कर रहा है । विरोध के नाम पर जो हंगामा हुआ उससे देश की जनता का काफी धन बर्वाद हुआ । एफ.डी.आई. के लिये मंजूरी मिलने से देश में विदेशी पूंजी का निवेश होगा तथा स्वदेशी व्यापार में भी वृद्धि होगी । आज के इस विश्व में हम अलग -थलग रहकर विकास नही कर सकते । प्रस्तुत शोध पत्र के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार भारतीय राजनीतिक दल राजनीति अपने वोट बैंक को ध्यान में रखते हुये करते है । एफ.डी.आई. क्या हैं ? इससे क्या क्या लाभ और नुकसान की सम्भावना है, जनता को इससे क्या लाभ होगा, आदि पर अपना सुझाव प्रस्तुत करना है ।
प्रस्तावना -
बीसवीं शताब्दी में संचार व्यवस्था के क्रांतिकारी परिवर्तनो ने विश्व को एक भूमण्डलीय ग्राम का रूप दे दिया है । 1991 के पश्चात नई आर्थिक नीति उदारीकरण तथा वैश्वीकरण ने भारतीय बाजार के द्वार विदेशी व्यापारियों के लिये खोल दिये । इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पिछले दो दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व सुधार हुआ है । भारतीय जनमानस की आर्थिक हालात में परिवर्तन साफ नजर आ रहा है । परन्तु जब नई आर्थिक नीति घोशित की गयी थी तब भी आशंका व्यक्त की गई थी कि इसके परिणाम हानिकारक होंगे । आशंका निर्मूल साबित हुई तथा देश विकास के पथ की ओर अग्रसर है । हमारे व्यापार की जडे लोकतन्त्र मे जमी हुई है । पिछले 10 वर्शो की स्थायी सरकार ने विदेशी व्यापारियों को अच्छा माहौल प्रदान किया और वे भारत में निवेश एवं व्यापार में अपनी रूचि प्रदर्शित कर रहे हैं । अति उत्साहित
केन्द्र सरकार ने इसी कड़ी में भारतीय खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति देने का इरादा व्यक्त किया । इस हेतु संसद से अनुमति लिया जाना आवश्यक था । केन्द्र की गठबन्धन सरकार ने नियम 184, 168 के तहत संसद में बहस कराकर विधेयक पारित करवाया। संसद के दोनो सदनों में मतदान के बाद परिणाम की घोशणा सरकार के पक्ष में हुई और संसद ने खुदरा व्यापार में एफ डी आई को मंजूरी दे दी । खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का फैसला भारत के शताब्दियों पुराने व्यापार के स्वरूप के बदलने का पहला बडा कदम है। भारत ईसा से 400 वर्श पूर्व से व्यापार का देश है। सैकडों वर्शो कई पीढियों लम्बी परम्पराओं और बडी आबादी ने खुदरा कारोबार को देश का सबसे सहज कारोबार बना दिया है। लाखों छोटी बडीदुकानों मे फैला यह भीमकाय करोबार अलग-अलग आंकलनों के मुताबिक 20,000 अरब रूपये का है। यह पहला मौका है जब संसद ने भारत की सबसे बडी कारोबारी गतिविधि के स्वरूप को बदलने पर चर्चा की जो अपनी अनेको कमजोरियों, खामियों, के बाबजूद सर्दियों से भारतीय नगरीय जीवन की आर्थिक बुनियाद रहा है ।
एफ.डी.आई से आशय:-
एफ डी आई का अर्थ है प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश । रिटेल का अर्थ है खुदरा व्यापार क्षेत्र । सरकार चाहती है कि विदेशी कम्पनियाॅं भारतीय खुदरा क्षेत्र में खुलकर निवेश करें । मल्टी ब्राण्ड रिटेल मे विदेशी कम्पनियों की हिस्सेदारी 51फीसदी जबकि सिंगल ब्राण्ड में 100 फीसदी हो जायेगी । विदेशी कम्पनियाॅं 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में आडट लेट खोल सकेंगी ।
एफ.डी.आई. की ऐतिहासिक पृश्ठभूमि:-
भारतीय राजनीतिक दल यदा कदा एफ.डी.आई. की बात अतीत में करते रहे है । 2004 में एन.डी.ए. सरकार ने अपने चुनाव पूर्ण घोशणा पत्र में रिटेल में एफ.डी.आई. को लागू करने की बात कहीं थी । 2005 में यू.पी.ए. सरकार के इण्डस्ट्रियल पाॅलिसी और प्रमोशन विभाग ने एफ.डी.आई. को अनुमति के लिये एक कैविनेट नोट तैयार किया । 2006 में सिंगल ब्राण्ड में 51 फीसदी और होलसैल में कैश एण्ड कैरी को सौ फीसदी एफ.डी.आई. को मंजूरी मिली और बालमार्ट ने भारत में कदम रखा । 2010 में मल्टी ब्राण्ड और खाद्यान्न रिटेल में एफ.डी.आई. पर सरकार में एक राय नही बन पाई । कांग्रेस दल के अन्दर भी चर्चा होती रही । 2010 में कांग्रेस ने अपने सहयोगियों को आश्वासन दिया कि जब तक एफ.डी.आई. पर आम सहमति नही बन जाती, इसे मंजूरी नही दी जायेगी । परन्तु सरकार ने 14 सितम्बर 2012 को मल्टी ब्राण्ड खुदरा व्यापार में 51 फीसदी नागरिक उडड्यन में 49 फीसदी एफ.डी.आई. को मंजूरी दे दी ।
भारतीय खुदरा व्यापार की कमियाॅं:-
भारत में रिटेल व व्यवसाय के क्षेत्र में बहुत सी कमियाॅं है। झूंठे, गलत विज्ञापन जनता को भ्रमित कर रहे है । विज्ञापनों के माध्यम से उत्पाद को बढा चढाकर इस तरह पेश किया जाता है कि भारत की भोली भाली जनता उत्पाद की ओर आकर्शित हो जाती है । अगस्त 2012 मे ही अडवर्टाइजिंग स्टेण्डर्ड काउंसिल आॅफ इण्डिया, कंज्यूमर कम्प्लेंट काउंसिल (सी.सी.पी.), ने 30 में से 23 विज्ञापनों को भ्रमित करने वाला पाया । गलत विज्ञापनों में बडी कम्पनियाॅं भी शामिल है । उपभोक्ताओं की यह एक बडी शिकायत है कि उन्हे गलत विज्ञापनों के जाल में फसाया जाता है ।
भारतीय बाजार में मिलावट में वृद्धि हुई है । मिलावट करना तो आम बात है । भारतीय उपभोक्ता मिलावट को लेकर बेहद चिंतित है । शुद्धता की कोई गारंटी नही है । चार दशक से भी ज्यादा समय से खाद्य पदार्थो के परीक्षण में लंग विशेशज्ञ डाॅ. अरविंद शिनाॅय का मानना है कि भारत में 25 से 30 प्रतिशत खाद्य सामग्रियों में जानबूझकर मिलावट की जाती है । जब दूध जैसे उत्पाद में स्टाॅर्च, सोडियम हाइड्रोक्साइड (काॅस्टिक सोडा) यूरिया, शक्कर, हाइड्रटेड लाइम, फोमलिन, अमोनियम, सल्फेट व सोडियम कार्बोनेट जैसे तत्व पाये जाते है तो बाकी चीजों का अनुमान भर लगाया जा सकता है1। खुदरा क्षेत्र में ऐसे अनगिनत लोग है जिन्हे कम तौलने की आदत है। कहीं पैकेट बंद सामान तौल में कम होता है तो कहीं तराजू और बांट की गडबडी होती है । सामान के साथ पैकेट भी तौल लिया जाता है । आज भी कई दुकानों में ईंट और पत्थर के बांट देखे जा सकते है । बाट को घिस कर थोडा हल्का करने का तरीका पुराना है । मापतौल विभाग जनता के पैसे पर चलता है लेकिन शिकायत रहती है । कि इसे दलाल व व्यापारी ही मनमर्जी से चलाते है ना ही छापा मारने में ईमानदारी होती है और ना ही गडबडी पाये जाने पर कार्यवाही करने में।2 भारत सरकार का यह मानना है कि रिटेल में एफ.डी.आई. आने पर लोगों को गुणवत्ता वाले उत्पाद मिलेगे, यानि अभी जो उत्पाद मिल रहे है वो गुणवत्ता वाले नहीं है ।
खुदरा व्यापारी गरीब ग्राहकों का तीन प्रकार से शोशण करते है ।
100-150 रू. के गलत सामान की शिकायत के लिये कोई उपभोक्ता अदालत क्यों जायेगा ? कई खुदरा व्यापारी गरीबों को मनमानी कीमत पर सामान बेचते है । उधार का जाल फैलाये रखते है । सस्ते नकली सामान के चक्कर में गरीब की सेहत के साथ सबसे ज्यादा खिलवाड़ होता है । भारत में खुदरा व्यापार में बहुत मामूली हिस्से में है रसीद की लेन देन होती है जबकि अधिकांशत लेनदेन बिना रसीद के ही होता है । इसका अर्थ यह है कि कर के रूप में भी एक बहुत बडा हिस्सा चोरी होता होगा । अभी जो बडी खुदरा कम्पनियाॅं है, उन्होने रसीद की शुरूआत की है जिसमें बिना रसीद एक रूपये का सामान भी नही बिकता है । भारतीय उपभोक्ताओं को शिकायत है कि यहाॅं दवा खरीदने पर भी रसीद बहुत मांगने पर ही मिलती है । भारतीय उपभोक्ता का शोशण पग-पग पर हो रहा है । ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में खुदरा व्यापारी किसी भी हद तक चले जाते है । कडी मेहनत और ईमानदारी से पैदा किये गये किसान के अनाज की सही कीमत नही मिलती जबकि उसे आवश्यकता की अन्य सामग्री इसी अनाज को बेचकर ही कृय करना होती है ।
एफ.डी.आई. और भारतीय राजनीतिक दलों की चिंता:- भारत के प्रत्येक शहर, गाॅंव और गली मोहल्लों में फैला हुआ खुदरा बाजार 2008-09 में 17594 अरब रू. का था जो 2004-05 के बाद में औसतन 12 प्रतिशत वार्शिक की गति से बढ रहा है । जिसके 2020 तक 53517 अरब रूपये का हो जाने का अनुमान है । तेज विकास के बावजूद संगठित रिटेल पिछले एक दशक में कुल खुदरा बाजार में केवल 5 फीसदी हिस्सा ले पाया है । इस पांच फीसदी हिस्से ने करीब 1 करोड़ रोजगार पैदा किये है जो 2020 तक 1.84 करोड हो जाने की आशा है ।
खुदरा कारोबार में विदेशी कम्पनियों का खौप नया नही है । वालमार्ट, टेस्को, और कार्फ जैसे रिटेल दिग्गजों के छोटे देशों में असर की कहानियों से यह डर और बढ़ रहा है । भारत में खुदरा कारोबार में 61 प्रतिशत हिस्सा खाद्य उत्पादों (अनाज, दाल, फल, सब्जी, दूध, चाय, काफी, अण्डा, चिकन, मसाले) का है । जो करीब 11000 अरब रूपये का होता है । ना बार्ड के एक सर्वेक्षण के मुताबिक इस कारोबार पर असंगठित क्षेत्र का कब्जा है । असंगठित क्षेत्र की दुकाने उपभोक्ताओ ंके घर से औसतन 280 मीटर की दूरी पर स्थित हैं जहाॅं से उपभोक्ता अपनी मासिक उच्च खरीद करता है । परम्परागत भारतीय खुदरा क्षेत्र में 440 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है । रिटेल क्षेत्र से 1760 लाख लोग जीवन यापन के साधन जुटा रहे हैं । सम्पूर्ण भारतीय व्यापार 24300 करोड रूपयों का हो चुका है एवं संगठित रिटेल कारोबार 12150 करोड रूपये के करीब पहुॅच चुका है ।
भारतीय राजनीतिक दलों ने एफ.डी.आई. का विरोध अपने अपने तरीके से किया । माक्र्सवादी पार्टी विदेशी पूंजी की विरोधी नही है उसका मत है कि विदेशी पूंजी अपने देश की अर्थव्यवस्था को बढावा देने हेतु तीन शर्तो के आधार पर निवेश कराई जा सकती है ।
1. विदेशी पूंजी के आने से देश के अन्दर रोजगार बढे ।
2. विदेशी पूंजी के निवेश से देश के अन्दर उत्पादन ताकत बढे ।
3. विदेशी पूंजी के आने से देश के अन्दर तकनीकी में सुधार हो ।
अगर यदि उपर्युक्त तीनो फायदे विदेशी पूंजी निवेश से होते है तो लोगों का इसमें भला होगा लेकिन यहाॅं खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी आने से ये तीनों बाते नही मिलती बल्कि इसके परिणाम विपरीत होगे । विदेशी कम्पनियाॅं मूल भूत ढांचा नहीं बनायेंगी । कोल्ड स्टोरेज, बिजली, सडके, जैसी बुनियादी सुविधाये हमें पहले उपलब्ध करानी होंगी । जब तक ये सुविधायें उपलब्ध नही होती विदेशी पूंजी का कोई फायदा नही होगा । विदेशी पूंजी खुदरा व्यापार में आने से अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।3
संसद में नियम 184 के तहत चर्चा में भारतीय जनता पार्टी ने एफ.डी.आई. को विकास की सीढी नही बल्कि विनाश का गडढा बताया । भाजपा ने एफडीआई पर जुडे हर एक मुद्दांे पर सरकार के दावों पर उंगली उठाई । यद्यपि पूर्व में राजग सरकार ने एफ.डी.आई. का पक्ष लिया था लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई की अध्यक्षता में बनी समिति ने इसे खारिज कर दिया था ।4 भाजपा का तर्क था कि अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित दुनिया के कई देशों में इसके खिलाफ आन्दोलन हो रहे हैं । वहाॅं की सरकारों ने छोटे कारोबारियों के हितों की सुरक्षा के लिये कदम उठाये है लेकिन स प्र.ग. सरकार उलट कदम बढा रही है ।5
समाजवादी पार्टी ने एफ.डी.आई. पर चिन्ता व्यक्त की । एफ.डी.आई. देश के हित में नही है । उसने सरकार को अपनी गलती सुधारने की हिमायत दी । तृणमूल कांग्रेस का विचार है कि एफ.डी.आई. राश्ट्रीयता और सिद्धान्त का सवाल है । तीन बडी कम्पनियाॅं रिटेल में है - वाल मार्ट, टेस्को, और मेट्रो । वालमार्ट या तो अमेरिका या चीन की मदद करेगी भारत की नहीं । भारतीय संसद भी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट मे ंआशंका व्यक्त की कि यह छोटी दुकानों और रोजगार को खत्म कर देगी । बसपा ने भी एफ.डी.आई. को देश के हित में नही बताकर विरोध जाहिर किया ।
कांग्रेस ने एफ.डी.आई. पर अपना पक्ष रखते हुये कहा कि सरकार ने विपक्ष को धोखा नही दिया है । देश को आज हर कीमत पर 100 मिलियन डालकर के निवेश की जरूरत है ।आज जरूरत के आधार पर निवेश की खातिर खुदरा ब्राण्ड के लिये एफ.डी.आई. के दरवाजें खोले गये है । युवाओं को रोजगार देने के लिये निर्माण क्षेत्र में निवेश जरूरी है ।
देश के जाने माने उद्योगपति रतन टाटा ने सरकार द्वारा उठाये गये कदमों का स्वागत करते हुये कहा कि एफ डी आई और अन्य चीजों के लिये सरकार ने जो किया उसमें कुछ हद तक विश्वास बहाल होगा, हालाकि इतना ही पर्याप्त नही है । लोगों को विश्वास दिलाना होगा । उनका डर दूर किया जाना भी जरूरी है ।6
एफ.डी.आई पर मतदान:-
मल्टी ब्राण्ड खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर जारी गतिरोध सरकार द्वारा लोकसभा में नियम 184 तथा राज्य सभा में नियम 168 के तहत चर्चा कराये जाने की स्वीकृति दिये जाने के साथ खत्म हो गया । लोकसभा तथा राज्यसभा में इस मुद्दे पर चर्चा के बाद मतदान हुआ । लोकसभा में सरकार के समर्थन में 253 तथा विरोध में 218 मत पडें । राज्यसभा में एफ.डी.आई के खिलाफ लाया गया विपक्ष का प्रस्ताव 125 के मुकावले 109 मतों पे गिर गया । मतदान के नतीजों से उत्साहित सरकार ने दावा किया कि उसके सुधार सही दिशा मे हैं । एफ.डी.आई. पर संसद की मुहर लगने के साथ ही कार्फू, टेस्को तथा वालमार्ट जैसी मल्टी नेशनल कम्पनियों के लिये भारत में रिटेल स्टोर खोलने की सारी बाधाए दूर हो गयी ।7
रिटेल में एफ डी आई को संसद में मंजूरी मिल जाने के बाद प्रश्न यह उठता है कि क्या राजनीतिक हित जनहित से बडा हो गया है ? क्या नीतियों पर राजनीति हावी हो गई हें ? विदेशी निवेश के मुद्दे पर चली बहस में तो ऐसा ही प्रतीत होता है । कौन सा दल सही बोल रहा है और कौन सा दल असत्य बोल रहा है, किसकी बात पर भरोसा किया जायें । देश में इस मुद्दे पर आम राय नही है । राय देने वालो के अपने-अपने में हित है । भारतीय राजनीतिक दल सदैव अवसरवादी नीति अपनाते रहे है । किसी भी मुद्दे पर तात्कालिक लाभ देखकर नीतियाॅं तय करती है । यह समझना मुश्किल है कि भारत के किस राजनीतिक दल की क्या नीति है । एफ डी आई पर यह अच्छा होता कि सभी दल एक नीति बनाकर निर्णय करते । अनावश्यक राजनीति में समय और धन दोनो ही बर्बाद हुआ । कुछ दल तो इतनी लापरवाही का प्रदर्शन करते है कि उन्हे अपनीय विश्वसनीयता की भी कोई परवाह नही है । वे जनता के सामने कुछ कहते है और सरकार के सामने कुछ और । कई दल सरकारी नीतियों को जन विरोधी तो मानते हैं लेकिन वे सरकार को गिराना नही चाहते । ऐसा क्यों ? लोकपाल, कालाधन, भ्रश्टाचार, आतंकवाद, आर्थिक सुधार जैसे कई मामले है, जिसमें दलो ने अपना ही नही देश का भी माखौल बना रखा है । आज देश के ज्यादातर अर्थशास्त्री चिन्तित हैं । भारतीय जनता पार्टी का पक्ष भी समझ में नही आता । वे कभी समर्थन मे थे लेकिन आज विरोध में । जब वह सत्ता में थी तब भी वह रिटेल में एफ डी आई. के लिये प्रयास कर रही थी । मतदान की मांग तो शुद्ध रूप में राजनीति है । यह अच्छी अर्थ नीति का संकेत नही है । सपा और बसपा जैसे दल तो बस सत्ता का खेल खेल रहे है । देश की चिन्ता भले न हो कुछ छोटे दलों को सरकार बचाने की कीमत जरूर चाहिये ।
उपसंहार:-
संसद से हरी झण्डी मिल जाने के बाद अब मल्टी ब्राण्ड में विदेशी रिटेलर्स के कदम भारतीय बाजार की ओर बढेंगे। ऐसे में मल्टी ब्राण्ड रिटेलर्स के नये परिदृश्य के बाद उपभोक्ताओं और सम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था को लाभान्वित करने के लिये दो बातो पर ध्यान देना आवश्यक होगा । एक छोटे कारोबारियों के मन से व्यापार सम्बन्धी डर को हटाना और दो मल्टी ब्राण्ड रिटेल के लिये आने वाली बहुराश्ट्रीय कम्पनियों का व्यापार निर्धारित शर्तो और नियमों के तहत सुनिश्चित करना । रिटेल में एफ डी आई के आने से भारतीय छोटे कारोबारियों को अधिक डरने की जरूरत नहीं है । पहली बार जब देश में रिटेल व्यापार मे संगठित सेक्टर ने प्रवेश किया था तो भी इसका बडा विरोध हुआ था । लेकिन आज छोटे कारोबारी विग बाजार, रिलायंस रिटेल, स्पेंसर्स, क्रोम या अन्य कम्पनियों के आने के बाद भी अपना कार्य अच्छी तरह कर रहे हैं । देशी रिटेल इतना कमजोर नही है कि वालमार्ट और कार्फ जैसी कम्पनियों का यहाॅं कब्जा हो जायेगा । देश के कोने-कोने में व्यापार कर रहे छोटे छोटे कारोबारियों को डरने की जरूरत इसलिये भी नही है क्योंकि केवल उन शहरों मे एफ.डी.आई. लागू होगी जहाॅं की जनसंख्या 10 लाख से ज्यादा है । ऐसे शहरो की संख्या 53 है । चूंकि एफ.डी.आई. लागू करने की जिम्मेदारी राज्यों के मुख्य मंत्रियों को सौपी गयी है । ऐसे में इसकी परिधि में आने वाले शहरों की संख्या मात्र 18 बचती है । इन शहरों के अन्दर स्टोर खोलने के लिये पर्याप्त जगह नही है ऐसे में 10 या 12 कि.मी. की दूरी पर स्टोर खोलना पडेगा जिसके लिये जमीन अत्यधिक महंगी पडेगी ।साथ ही उपभोक्ता सामग्री क्रय हेतु इतनी लम्बी दूरी मुश्किल में तय करेंगे । भारत सरकार के लिये भी जरूरी है कि मल्टी ब्राण्ड रिटेल कम्पनियों को जिन शर्तो के आधार पर एफ.डी.आई. की स्वीकृति दी गई है उन निर्धारित शर्तो का कठोरता पूर्व पालन करायें । सभी विदेशी कम्पनियां अपने देश की व्यापार संहिता का पालन करें । भारत को अपनी व्यापार शर्तो के तहत गुणवत्ता अनुबन्ध प्रक्रिया और कीमत से जुडे मानक इतने कडे करने होगे कि ये विदेशी कम्पनियां देशी रिटेल कारोबार को चोट न पहॅुचा पाये । हमें यह ध्यान रखना होगा कि देश के करोडो उपभोक्ताओ ंको सस्ता सामान देने के लिये बहुराश्ट्रीय कम्पनियाॅं बाहर से चीजें मंगाकर बेचने का ही काम न करें, वरन वे व्यापार की शर्तो के तहत भारत में वेयर हाउस बनाने, कोल्ड चेन स्थापित करने तथा प्रसंस्करण इन्फ्रास्ट्रक्चर खडा करने का कार्य करें । बहुराश्ट्रीय कम्पनियों के लिये हमें देश में कारोबार की गुणवत्ता नियंत्रण संस्थाओं की मजबूती और उनमें नये कलेवर पर भी ध्यान देना होगा । छोटे कारोंवारियों को भी विक्रयकला और ग्राहक सेवा के नये पाठ पढानें होगे । ऐसा किये जाने पर ही मल्टी ब्राण्ड रिटेल में एफ.डी.आई. से देश के छोटे कारोबारियों के हितों की रक्षा की जा सकेगी और उपभोक्ताओं तथा किसानों को लाभ मिल सकेंगे ।
हमारी आर्थिक समस्याओं का हल या निराकरण विदेशी निवेश है, ऐसा नही है लेकिन यह सत्य है कि आजहमारे देश में उत्पादक बदहाल है और उपभोक्ता मंहगाई से त्रस्त है । फायदे में सिर्फ और सिर्फ विचैलियें और फुटकर दुकानदार हैं । विचैलिये उपभोक्ताओं को आंख मूंदकर लूटते हैं । एफ डी आई से विचैलिये और दुकानदारों का नुकसान होगा लेकिन इनकी आड में उपभोक्ताओं को नुकसान नही पहुॅंचाया जा सकता । 21वीं सदी में जब हम आर्थिक क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहे है तो हमें सोंच का दायरा बढाना होगा । यदि हम दुनिया भर के फायदे हासिल करना चाहते है तो दूसरों को भी हक है कि वे हमसे फायदा उठाये । प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नाम पर जो यह कट्टरता है, वह और कुछ नहीं वह सिर्फ भोथरा भावुकतावाद है । राजनीतिक दल जनता के सामने अपने आपको ज्यादा देशभक्त, ज्यादा राश्ट्रवादी दिखाने और बताने के लिये एफ.डी.आई. का विरोध कर रहे हैं । जो लोग विदेशी निवेश का विरोध कर रहें है, उन्हे एक एक चींज को एक-एक नजर से नही देखना होगा उन्हे समग्रता से देखना होगा कि हम आुधनिक विश्व में प्रतिस्पर्धी होना चाहते है या सबसे कट कर एकांत में 17वीं सदी का जीवन जीना चाहते हैं । यदि हम सुपर पावर बनना चाहते है तो हमें दुनिया से मिलकर चलना होगा ।
सन्दर्भ:-
1. दैनिक पत्रिका, ग्वालियर 02 दिसम्बर 2012 पृश्ठ 02
2. दैनिक पत्रिका, ग्वालियर 02 दिसम्बर 2012 पृश्ठ 02
3. दैनिक पत्रिका, ग्वालियर 8 दिसम्बर 2012 पृश्ठ 8
4. दैनिक पत्रिका, ग्वालियर 5 दिसम्बर 2012 पृश्ठ 1
5. दैनिक पत्रिका, ग्वालियर, 5 दिसम्बर 2012 पृश्ठ 1
6. दैनिक जागरण ग्वालियर, 10 दिसम्बर 2012 पृश्ठ 8
7. दैनिक पत्रिका, ग्वालियर, 12 दिसम्बर 2012 पृश्ठ 6
Received on 20.03.2013
Modified on 12.04.2013
Accepted on 20.04.2013
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Research J. Humanities and Social Sciences. 4(1): January-March, 2013, 114-118